बहुत निराश हुआ चालीस बरस बाद अपने स्कूेल जा कर

बहुत निराश हुआ चालीस बरस बाद अपने स्कूकल जा कर

  बहुत बरसों से ये इच्‍छा थी कि अगली बार जब भी अपने शहर देहरादून जाऊं, उस गांधी स्‍कूल में जरूर जाऊं जहां से मैंने 1968 में हाईस्‍कूल पास किया था। बेशक 1974 में नौकरियों के चक्‍कर में हमेशा के लिए मैंने अपना शहर छोड़ दिया था और उसके बाद भी  कुछ बरस तक वहां…

नमक के बहाने

नमक के बहाने

पुणे में वह मेरा आखिरी दिन था। लगभग पचास महीने वहां बिताने के बाद मैं मुंबई वा‍पिस जा रहा था। जो दो एक दावतनामे थे, वे निपट चुके थे। मैं वहां अपने आखिरी दिनों में होटलों में ही खाना खा रहा था। बेशक सामान बाद में ले जाता, मैं अगली सुबह वापिस जा रहा था।…

चार्ली चैप्लिन होने का मतलब

चार्ली चैप्लिन होने का मतलब

फ्रैंक हैरीज़, चार्ली चैप्लिन के समकालीन लेखक और पत्रकार ने अपनी किताब चार्ली चैप्लिन को भेजते उस पर निम्नलिखित पंक्तियां लिखी थीं: चार्ली चैप्लिन को उन कुछ व्यक्तियों में से एक जिन्होंने बिना परिचय के भी मेरी सहायता की थी, एक ऐसे शख्स, हास्य में जिनकी दुर्लभ कलात्मकता की मैंने हमेशा सराहना की है, क्योंकि…

कितना अच्छा दिन

कितना अच्छा दिन

सुबह सुहानी है। मौसम मीठा मीठा सा तराना छेड़े हुए है। आज का दिन हमारे लिए खास है। बड़ा बेटा अपनी पहली नौकरी पर गया है। नागपुर से बीटेक और आइआइएम, लखनऊ से एमबीए करने के बाद। मेरे खराब स्वा स्य् ब के बावजूद मेरी हिम्मकत बढ़ाने के लिए उसने मुझे अपने पैंट कमीज प्रेस…

कठपुतली का खेल

कठपुतली का खेल

पिछले कुछ दिनों अस्पताल में रहना पड़ा तो पहले भी कई बार देखी फिल्म साउंड ऑफ म्यूजिक अपने लैपटॉप पर देख रहा था। फिल्म में एक दृश्य है जिसमें बच्चे घर पर ही अपने मेहमानों को कठपुतली का खेल दिखाते हैं। इस दृश्य को देख कर अपने बचपन के दिन याद आ गये जब हमें…

अच्‍छी किताबें पाठकों की मोहताज नहीं होतीं।

अच्‍छी किताबें पाठकों की मोहताज नहीं होतीं।

अच्‍छी किताबें पाठकों की मोहताज नहीं होतीं। वे अपने पाठक खुद ढूंढ लेती हैं। उन्‍हें कहीं नहीं जाना पड़ता, पाठक ही अच्‍छी किताबों की तलाश में भटकते रहते हैं। अच्‍छी किताबें पा लेने पर पाठक की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। किताबें जितनी ज्‍यादा पुरानी, पुरानेपन की हल्‍की-सी गंध लिये और हाथ लगाते ही फटने-फटने…

The Terrifying Face of Art

“Art”- a word which has become so generic that it is used for conveying anything beyond the understanding of the ordinary, average, not-so-intellectual person.  The average person, when he hears the word, imagines a museum or an art gallery filled with beautiful still life, scenic beauty and models looking grave and sculptures so beautifully structured…