Mr. दाढ़ी महाराज

dadhi maharaj

यायावरी की धुन जब किसी पर सवार हो जाती है तो वो इंसान सिर्फ़ यात्राएं नहीं करता; वो बागता है ।

इन्हीं यात्राओं में कई अद्भुत जीव भी मिला करते हैं । जीव जो एक ही चीज़ से पूर्णतः अभिभूत होते हैं । जीव जो इस अंतहीन जीवन की एक ही पगडण्डी पहचानते हैं और उसी पर चलते हैं । रोज़ पीपीटी फाइल और रिपोर्ट बनाना और लैपटॉप को ही ज़िंदगी समझना । कहीं अगर वे भटक जायें तो उनका भी हाल उस शायर-सा हो जाता है जो डोर को सुलझा तो रहा है, पर उसे सिरा मिलता ही नहीं ।

परंतु विचित्रता के उदाहरण हर जगह होते हैं । चिलचिलाती गर्मी भी शीतल लगती है, अगर प्रवृत्ति ही घुमक्कड़ हो । पीपीटी में भी कई सृजनात्मक काण्ड हुए हैं और होते रहेंगे ।

तो ऐसे ही कुछ अनोखे विचार लिए, निकले हम गुडगाँव के सिकंदरपुर मेट्रो स्टेशन से, राजीव चौक की ओर ।

मौसम तो बारिश का था पर जैसे ही हम बाहर चले, गोरी-गोरी धूप गुनगुनाती हुई हमारे चेहरे से आ मिली । कुछ मिनट ही हुए चलते हुए कि गहरे काले बादलों का उन्माद सूरज को कनखियों से तांक-झांक करने पर मजबूर करने लगा । अंततः बादलों ने सूरज को दरकिनार कर धरती पर,  अमृत-से पानी का आचमन कर ही डाला । पर तब तक हम मेट्रो स्टेशन पहुंच चुके थे ।

कहने को हम दिल्ली एनसीआर के एक कोने में रहते हैं, पर कोने-कोने की ख़बर लगाने को चलते-फिरते ही रहते हैं । लेखक को और चाहिए भी क्या? कुछ नया दिखे तो वो कुछ नया लिखे । कुछ पुराना मिले तो वो पुराना और ज्यादा खिले ।

यहाँ बता दूँ कि सिकंदरपुर से राजीव चौक तक की  कुछ पचास-पचपन मिनट की यात्रा होती है ।

एक ज़माने के बाद आज चढ़ते ही ख़ाली सीट देवता के दर्शन हो गए । हमने उस अलौकिक शक्ति को मन ही मन धन्यवाद दिया । पर जैसे ही नज़र ऊपर लिखे शब्दों पर पड़ी, दिल वहीँ बैठ गया । लिखा था वृद्ध/विकलांगों के लिए” । इधर-उधर नज़र दौड़ाई और ये सोच के कि तड़के ही कौन वृद्ध/विकलांग मेट्रो का कष्ट उठाएगा, हम पधार गए ।

दो स्टेशन पश्चात ही एक क्लीन शेव्ड जेंटलमैन का अपनी फूल-सी बच्ची के साथ आगमन हुआ । हम भी टस से मस कहाँ होने वाले थे? जेंटलमैन वृद्ध/विकलांग वाली दो सीटें छोड़ कर तीसरी सीट पर बैठे जैसे उनका अपमान हो जाएगा, अगर वृद्ध/विकलांग वाली सीट पर बैठ गए तो । उनका बैठना देखकर लगा जैसे उनको झुकने की परिभाषा ही न आती हो । बच्ची सामने ही खड़ी हो गयी और खेलने में मगन हो गई । जेंटलमैन ने अपना संगणक(लैपटॉप) खोला और खो गए । जी हाँ! कंप्यूटर शुद्ध हिदी में संगणक कहलाता है ।

हम लग गए बच्ची को अपने तरह-तरह के चेहरे दिखाने में । पहले तो वो घबराई, फिर सहजता से हंसने लगी । जेंटलमैन भी एक कोने से मुस्करा दिए ।

खैर, अगला स्टेशन आया और एक महिला प्रकट हुईं । हमने पहले तो अपना अब तक सोया हुआ ईगो जगाया, फिर उसे संभाला और खड़े  गए । इतनी सारी मात्रा में ईगो प्रवाहित हो गया कि इस बात की भी हमने परवाह नहीं की कि भई बगल वाली सीट भी ख़ाली है ।

अगला स्टेशन आते ही वो महिला उतर भी गई । परंतु भीड़ अचानक ही बढ़ गई और धक्का-मुक्की की नौबत आते-आते बची । हम सीट की ओर लपके परंतु अफ़सोस! हमको मुँह की खानी पड़ी । पहली सीट हम हारे उस छोटी-सी बच्ची से । दूसरी भीड़ के अग्र भाग के नेता और इस कहानी के नायक Mr. दाढ़ी महाराज  से ।

स्थिति ऐसी थी कि कोने पे बच्ची, बीच में दाढ़ी महाराज, तीसरी सीट पर जेंटलमैन अपने संगणक के साथ ।

और हम, हम इनके सामने वाले पोल पर लटक लिए ।

वापस आते हैं हमारे नायक पर । दाढ़ी महाराज ! उनका अध्ययन करने पर एक ही वस्तु ने संपूर्ण आकर्षण खींच लिया । जी! उनकी दाढ़ी ने । यहाँ तक की ऐसा कि उनके नाइकी के महंगे वस्त्र भी नज़र न आयें उनकी दाढ़ी के आगे । भरपूर काली, पर्याप्त लम्बी और चमकदार । उनके हाव-भाव से दाढ़ी जीवित-सी लगती थी और उनका चेहरा भी दूध-सा सफ़ेद । बगल में क्लीन शेव्ड जेंटलमैन को ऐसी नजरो से देखा जैसे प्रताड़ना की सारी हदें पार कर उसे दण्डित करना चाहते हों । भाग्यवश हमारी दाढ़ी साधारण से थोड़ी सी बड़ी हो चली थी । हमें देखकर वो ऐसे मुस्कुराए जैसे उन्हें उनका छोटा दाढ़ी-भाई मिल गया हो । हमको लगा मानों कह रहे हों, “कीप इट अप, ब्रो!”

दाढ़ी महाराज की दाढ़ी ऐसी थी कि वो किसी प्रकार का दृढ़ निश्चय हो और दाढ़ी बढ़ाना उनका उत्तरदायित्व, धर्मं और कर्तव्य तीनों । अपनी दाढ़ी पर ऐसे हाथ फेरते जैसे ये उनके जीवन की सबसे बड़ी ख़ुशी हो । ऐसा लगता था कि उन्हें याद ही न होगा कि वो कभी दाढ़ी के बिना भी जीवित रहे हैं ।

हम भी ऐसे देख रहे थे जैसे कोई अचम्भा देख लिया हो । बहरहाल, दाढ़ी महाराज अपने जूते के फीते बाँधने नीचे झुके । साथ ही में बगल में बैठे जेंटलमैन का लैपटॉप का काम समाप्त हो चुका था । जेंटलमैन ने अपने पैरों के बीच फंसे बस्ते में लैपटॉप डालने की चेष्टा की । अब झुकना तो उनको आता था नहीं । लगे दूर से ही लैपटॉप को बस्ते के अन्दर फंसाने ।

इसी चक्कर में उनका बस्ता दाढ़ी महाराज की दाढ़ी से टकरा गया और उन्होंने सोया हुआ शेर जगा दिया ।

दाढ़ी महाराज आग बबूला हो गए । जेंटलमैन को खरी-खरी सुना डाली और बड़बड़ाते हुए ही फीता छोड़ अपनी दाढ़ी की आकृति वापस बनायीं और कंघी निकाल के दाढ़ी पुनः काढ़ी ।

जेंटलमैन के बस्ते ने बस दाढ़ी को छुआ ही था तो ऐसा था । अगर कहीं एकाध बाल टूट जाता तो महाप्रलय मचा देते दाढ़ी महाराज । वैसे दाढ़ी भी कुछ उनके पक्ष में लग रही थी । बस्ते के छूते ही अपने मालिक को भावी खतरे से आगाह कर दिया । हो सकता है दाढ़ी बस्ते की चैन में फंस जाती या लैपटॉप के मध्य आ जाती ।

साकेत स्टेशन पहुंचे तो भीड़ भयंकर मात्रा में उबल पड़ी ।

इसी घटनाक्रम में हमारी याददाश्त के अनुसार एक अभूतपूर्व घटना घटी । ग्रीन पार्क स्टेशन जैसे ही मेट्रो ने छोड़ा तो मेट्रो के सारे के सारे ए.सी. हो गए बंद ।

दस मिनट ही बीते थे अभी कि दाढ़ी महाराज के  बुरे हाल हो गए । गर्मी के मारे उनकी दाढ़ी में खुजली मच गई । ऊपर से भीड़ थी कि कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी । दाढ़ी महाराज बेचैन हो गए । कभी इधर मुड़ते । कभी बाहर निहारते ।

शायद उन्होंने अपने ईश्वर से याचना मन से की होगी क्योंकि कुछ मिनटों बाद ही आ गया था राजीव चौक ।

सीट के मोह में दाढ़ी महाराज औरों की तरह एक स्टेशन पहले ही दरवाज़े की ओर अग्रसर नहीं हुए । राजीव चौक आया, दाढ़ी महाराज उठे और उस बच्ची को बचाने के चक्कर में दरवाज़े और प्लेटफार्म के मध्य मुँह के बल धराशायी हो गए । उनके पीछे दो लड़कियाँ, जो पहले दाढ़ी महाराज की दाढ़ी पे मर मिटी थीं, उन पर ही पसर गईं । ऊपर से न जाने कितने लोग लातें चलाते हुए निकल गए । कम से कम एक मिनट बाद वे खड़े हुए । संभवतः दाढ़ी महाराज के जीवनकाल का सबसे दु:खद एवं लम्बा एक मिनट रहा होगा ये ।

हम अब तक कोने में दुबके हुए थे ।

जब भीड़ छटी तो भयावह नज़ारा था । दाढ़ी महाराज की एक तरफ की दाढ़ी क्षतिग्रस्त हो चुकी थी । करीबन सौ बालों का एक गुच्छा उनके जूतों तले मटियामेट हो रहा था । हमने दाढ़ी महाराज को देखा फिर उनकी दाढ़ी । ऐसा लगा जैसे किसी पेड़ से उसका हरा या किसी गुलाब से उसका लाल छीन लिया गया हो ।

दाढ़ी महाराज अपना हाथ अपनी दाढ़ी पर ले ही जाने वाले थे कि हम चीखे, “नहीं महाराज! ये अनर्थ ना करना” ।

हमको लगा कहीं आज वो पूरा राजीव चौक ही ना मिटटी में मिला दें ।

उन्होंने एक न मानी और तुरंत अपनी दाढ़ी पर पूरा का पूरा हाथ फेरा । फिर वे कुछ बोल ना सके । उनके चेहरे के भाव ऐसे थे की उनको कहीं भी चुल्लूभर पानी मिलता तो कूद पड़ते; दुनिया को आग लगाने के बाद । पर उन्होंने  जूते के नीचे दबे गुच्छे को उठाया और अपना-सा मुँह लेके पैरों को घसीटते हुए आगे बढ़ गए । हम भी चल दिए उनकी किस्मत को गलियां देते हुए । परंतु आज भी दाढ़ी महाराज का वो चेहरा हमारे लिए खतरनाक उदासी का सर्वोच्च पर्याय है ।

दाढ़ी तो उनकी कभी ना कभी वापस आ ही जाएगी परंतु अब वैसा अहंकार दाढ़ी महाराज से ना हो पाएगा क्योंकि वो अहंकार तो राजीव चौक के एक अदना से प्लेटफार्म पर चकनाचूर हो चुका था ।

 

Aman Upadhyay

Team StoryMirror

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