सर-ए-राह चलते चलते

raahgiri final

अगर आप पर कभी खाली हो तो एक बार अपने दिमाग पर ज़ोर डालिए कि आप आखिरी बार कब दौड़े थे और कब जोर से हँसे थे या कब सड़क खेल का मैदान बनी थी ।

बदलता वक़्त, बदलती अहमियत और अहमियत की तर्ज़ पर बदलती ज़िन्दगी । इस दौड़ती-सी ज़िन्दगी में, सब कुछ पाने की जद्दोजहद में हम कही-न-कही खो से गए हैं न । इसी के चलते आस-पास की दुनिया को तो छोडिये हम अपने आप तक को भूल गए हैं । सहूलियतो में इतना डूबे कि कुर्सी पर बैठे-बैठे बूढ़े होने लगे है । हालात ये है कि मशीनों को काबू में रखने के लिए ख़ुद पर काबू नहीं कर पाए । उस मैदान, मिटटी और पेड़ो की ताज़ी हवा से दूर होते ही, शारीरिक के साथ-साथ मानसिक तौर पर भी बीमार हो चुके हैं ।

बात 17 नवम्बर 2013 की है । जब रविवार की सुबह 6 बजे, बहुत से लोग गुडगाँव के हुडा सिटी सेंटर के आस-पास इकट्ठा होने लगे । सब लोग साईकिल चला रहे थे, योगा कर रहे थे, आपस में बातचीत कर रहे थे, दौड़ रहे थे, खेल रहे थे और न जाने क्या-क्या । हैरानी की बात तो ये थी की ये सब गतिविधियाँ सड़क पर हो रही थी । कोई गाडी नहीं कोई धुआं नहीं, था तो सिर्फ लोगो का अम्बार, जिनकी वजह से सड़के मैदान में तब्दील हो चुकी थी । इन सारी गतिविधियों को नाम दिया गया था ‘राहगिरी’ । धीरे-धीरे ये पूरी दिल्ली में फ़ैल गया और हर रविवार इसका जलवा दिखने लगा । क्नॉट प्लेस, द्वारका और रोहिणी में भी लोगो ने इसे बेहद पसंद किया । इस संकल्प को साकार करने में नगर निगम और पुलिस ने भी अपना पूरा योगदान दिया ।

अब लोगो को रविवार का नाम सुनकर छुट्टी नहीं राहगिरी याद आता है । दिन की शुरुआत अब व्यायाम से होने लगी । सबसे बड़ी और ध्यान देने वाली बात ये है की इसमें हर आयु और वर्ग के लोग शामिल होते । बूढा हो या बच्चा और चाहे कोई भी धर्म का क्यों न हो । एक वक़्त पर जब लोगो की जिंदगियों में तनाव बढ़ने लगा था और आपसी मतभेदो में भी वृद्धि आ रही थी, तब राहगिरी इन सब मसलो का हल बनकर सामने आया । अब राहगिरी व्यायाम गतिविधियों से कुछ बढ़कर था सबके लिए ।

बदलते वक़्त के दौरान इंसान ने कई मुकाम हासिल किये तरक्कियाँ की पर उनके आपस में मिलने का वक़्त कम होता चला गया । इसी बीच फेसबुक, ट्विटर हमारे बीच कूद पड़े, जिन्हें हमने सोशल मिडिया का नाम दिया । एक दूसरे से दूर होक भी सबको आपस में जोड़े रखने की इस तकनीक को लोगो न बेहद पसंद किया । लेकिन धीरे-धीरे इसी के कारण मानसिक तनाव और बढ़ने लगा । ताज्जुब  की बात ये है की जिस उम्र में बच्चो को मैदान की मिट्टी में लथपथ होना था उस उम्र में बच्चे स्मार्टफोन के ज़रिये सोशल मिडिया में सक्रिय होने लगे । इस वजह से बढे हो या बच्चे सब तनाव में रहने लगे । इसी बीच, सडको को मैदान में बदलकर ‘राहगिरी’ ने सबका ध्यान अपनी और खींचा । यहाँ बहुत से लोग एक दुसरे से अनजान थे, पर फिर भी एक दुसरे से मिल रहे थे  । असल में राहगिरी ने एक असली सोशल प्लेटफार्म बना दिया, जिसमे लोग व्यायाम के साथ अपने विचारो का आदान-प्रदान कर सकते थे । यहाँ पर लोग शारीरिक ही नहीं मानसिक तनाव से भी दूर होने लगे । बच्चो के लिए तो जैसे ये सपना सा था, जिन सडको पर धुआंधार गाड़ियाँ दौड़ा करती अब वो उन पर खेल रहे थे । स्मार्टफोन और कम्प्यूटर की दुनिया से निकलकर मैदान में कदम रखना, एक बेहतरीन अनुभव रहा । जिन के पास कभी एक दुसरे के लिए वक़्त नहीं था, अब वो सब एक साथ नज़र आ रहे थे । जिसके चलते लोगो की ज़िन्दगी भी किसी हद तक सुधरने लगी ।

‘राहगिरी’ अब भी आगे बढ़ता जा रहा, लेकिन आज भी ये एक सपने जैसा लगता है । कही-न-कही हमारी ज़िन्दगी में ये सब ज़रूरी भी है । देखते ही देखते राहगिरी भारत के और शहरों में भी पहुँच गया जिनमे हैदराबाद और भुवनेश्वर शामिल है और उम्मीद है कि एक विराम के बाद यह कई और जिन्दगियां सवारेगा ।

 

Rahul Kumar

Team StoryMirror

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