मुक्तिबोध का टेढ़ा चाँद

muktibodh

17 फरवरी 1964 l

भोपाल का हमीदिया अस्पताल l

डॉक्टर हार मान चुके थे l उन्हें भी अब कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही थी l फिर भी उन्होंने उनको दिल्ली ले जाने के लिए सलाह दी l गजानन माधव को अपना गुरु मान चुकेहरिशंकर परसाई, श्रीकांत वर्मा और अशोक वाजपयी ने ज़रा सी भी देर न करते हुए उन्हें दिल्ली ले जाने का इंतज़ाम किया l रेलगाड़ी के पहिये, लोहे की गाटरों पर दौड़े चले जा रहे थे l राजनंदगांव अब आँखों से ओझल होता जा रहा था l पेड़ो की कतारे रेलगाड़ी की दिशा से उलटी तरफ दौड़ रही थी l रेलगाड़ी की एक बर्थ पर गजानन माधव बेहोश पड़े थे, उनके पास बैठे हरिशंकर, श्रीकांत और अशोक के माथो पर चिंता की लहरें उफाने मार रही थी l दिल्ली पहुचते ही वो सीधे उनको एम्स लेकर गए, दिल्ली से अनजान एक दौड़ते शहर में वो भी दौड़ने लगे और एम्स पहुच कर गजानन माधव को वहां भर्ती कराया l डॉक्टरो ने इलाज शुरू किया, पर उनकी हालत सुधरने के बजाये और बिगड़ती जा रही थी l उनके शिष्यों के अगले आठ महीने एम्स में, गजानन माधव के पलंग के आस पास ही गुज़रे l अपनी हालत से आठ महीने लड़ने के बाद, 11 सितम्बर 1964 को गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ ने अपनी आखिरी साँस ली l दुनिया को विदा कह चुके ‘मुक्तिबोध’ को अपने पहले कविता संग्रह ‘चाँद का मुह टेढ़ा है’ , को देखने तक का वक़्त न मिला l अपनी रचनाओ के ज़रिये सबको नये बदलाव की ओर मोड़ वो बीच सफ़र में ही हमे छोड़ कर चले गए l

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हिंदी साहित्य में अपने विचारो से चौकाने वाले मुक्तिबोध ने एक वक़्त पर सरकार को भी हिला कर रख दिया था l अपने लेखन से उन्होंने ‘प्रयोगवादी’ और ‘आधुनिकता’ को हिंदी साहित्य से जोड़ा जो पुराने ढर्रे पर ही रुका पड़ा था l ‘नई कविता’ और ‘नईकहानी’ के नाम से उन्होंने एक आन्दोलन सा छेड़ दिया था, जिसे नये रचनाकारों का समर्थन मिला l अपने अलग तरह के भाषा के प्रयोग से उन्होंने समाज में सालो से पड़ी सिलाई तक को उधेड़ कर रख दिया lउनकी रचनाओ में समाज का निचला तबका या कहें की श्रमिक वर्ग की एक ख़ास जगह रहती है, जिसमे से उनकी रचना किसी बेल की तरह उस तबके से लिपटकर अपने मुकाम तक पहुचती है l शायद इसकी मुख्य वजह मार्क्सवाद रहा, जो उनको जीवन के हर मोड़ पर मिला l

इसकी शुरुआत शायद उनके विवाह से हुई l उन्होंने अपने परिवार के खिलाफ जाकर प्रेम विवाह किया, जो की लम्बे समय तक नहीं टिक पाया l साधारण सी ज़िन्दगी जीने वाले मुक्तिबोध की पत्नी ऐशोआराम की ज़िन्दगी जीने की आशा रखती थी l विपरीत विचारो के टकराने से, उनका साथ ज्यादा देर तक नहीं रहा l स्कूल में बच्चो को पढ़ाते-पढ़ाते, मुक्तिबोध शुजालपुर के शारदा शिक्षा सदन में अध्यापक नियुक्त किये गए,उस वक़्त शुजालपुर में मार्क्सवाद छाया हुआ था, वहां रहते हुए उनकी कविताओ पर मार्क्सवाद का असर दिखने लगा l कुछ समय बाद उन्होंने नागपुर में रहते हुए ‘नया खून’ नाम की पत्रिका के लिए लिखना शुरू किया,उस पत्रिका का भी झुकाव मार्क्सवाद की तरफ था l इसी के साथ उन्होंने दो और पत्रिकाओं ‘कामयानी’ और ‘वसुधा’ के लिए आलोचनात्मक लेखन शुरू किया l मुक्तिबोध नागपुर के शुक्रवारी में तिलक की मूर्ति के पास की गली में रहा करते थे l उनका वक़्त अब मजदूरों के बीच राजनीति और साहित्य की चर्चा करते हुए बीतने लगाl एक बार एक्सप्रेस मिल के मज़दूर हड़ताल पर थे, एक रिपोर्टर की हैसियत से मुक्तिबोध वहां पर मौजूद थे l तभी वहां गोलियां चल पड़ी, उन्होंने अपनी आँखों से खून बहते देखा, अफरा तफरी में वो समझ नहीं पा रहे थे की क्या करे l इस घटना ने उन्हें अंदर तक हिला कर रख दिया और उनकी रचना में मार्क्सवाद छा सा गया l

मुक्तिबोध ने अपनी ज़िन्दगी में कई परेशानियों का सामना किया, चाहे वो आर्थिक हो, समाजिक हो या फिर राजनैतिक, पर वो अपनी जगह से नहीं हिले और निरंतर लिखते रहे l अपने जीवन केआखिरी वक़्त में मुक्तिबोध ने बहुत दुःख झेला l बहुत अफ़सोस की बात है कि उनके जीते जी उनको और उनकी रचनाओ को वो सम्मान प्राप्त नही हुआ, जो उनके मरने के बाद प्राप्त हुआ l

Team StoryMirror

Rahul Kumar

 

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