कुंभ की अमृत धारा

KUMBH MELA

क्षिप्रा के क्षितिज से निकलते सूरज की छनछनाती धुप में चमकती पानी की बुँदे, सरसराती हवा में तैरती सी नज़र आती है l साधुओ की जटाओ में लिपटी आस्था और भस्म से सनी काया में उज्जैन रात में भी पूर्णिमा के चाँद की तरह चमकता है l साधुओ की सालों की तपस्या उज्जैन की क्षिप्रा नदी के पास आकर पूरी होती है l शिप्रा नदी का तट शिव भक्तो के पैरो के निशानों से भर सा जाता है l शिव की भक्ति में लीन भक्त , क्षिप्रा के घाटो पर बैठ चिलम के दूधिया धुएं से चित्रकारी करते नज़र आते है l

हर 12 साल के अंतराल के बाद उज्जैन में भक्तो का मेला सा लगता है , जो की सिंहस्थ कुम्भ के नाम से जाना जाता है l जो हर बार की तरह एक नई ऊर्जा के साथ इस बार भी अपने साथ एक नई ऊर्जा को लेकर आया है l

वेद पुराणों,लोककथाओ और लोकगीतों से पता चलता है की, हिमालय के पास क्षीरोप सागर के तट पर देवताओं और राक्षसों ने मिलकर समुन्द्रमंथन किया, मंथन के दौरान 14 रत्न प्राप्त हुए जिसमे सबसे पहले विष का प्याला और सबसे आखिरी में एक अमृत कलश बाहर आया l कलश के निकलते ही इंद्र का बेटा जयंत अमृत कलश को लेकर स्वर्ग कीओर भागा l यह देखकर राक्षसों का जी तिलमिला उठा और उसका पीछा कर उससे अमृत कलश को छिनने लगे l देवताओ और राक्षसों में युद्ध कुल 12 दिन तक चलता रहा , जो की इंसानों के लिए 12 साल के बराबर होते है l इसी आपाधापी में अमृत की 4 बूंदे, हर 3 दिन के अंतराल के बाद (धरती पर 3 साल के बराबर)  धरती पर गंगा, यमुना, गोदावरी, और क्षिप्रा नदी में आ गिरी l तब से नदियाँ पवित्र हो गई l युद्ध को समाप्त करने केलिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप लेकर, राक्षसों का ध्यान बटाकर अमृत देवताओ को पिला दिया l अंत में देवताओ ने राक्षसों से युद्ध कर स्वर्ग को वापस से जीत लिया l क्षिप्रा नदी भी अमृत की बूँद के कारण पवित्र हो चुकी थी, और तभी से उज्जैन सिंहस्थ का आरम्भ हुआ l

उज्जैन से गुज़रती क्षिप्रा नदी में हर साल लाखो की संख्या में भक्त अपने पापो से मुक्ति पाने के लिए स्नान करने आते है। हर बार की तरह इस बार भी उन्ज्जैन में देश भर से आये अखाड़ो का जमावड़ा लगाहै। ये अखाड़े देश के अलग अलग हिस्सों से आकर, अपना शक्ति प्रदर्शन करते है । इसी उत्सव के दौरान वो अपने कई शिष्यो को साधू की उपाधियाँ प्रदान करते है। इन सबअखाड़ो में सेतीन मुख्यअखाड़ेजूना अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा और महनिर्वानी अखाड़ा है । इन अखाड़ो का मुख्यआकर्षण ‘नागा साधू’होते है जिन्होने बहुत कड़ी तपस्या के बाद नागा के उपाधि प्राप्त की होती है। क्षिप्रा के हर घाट, रामघाट से लेकर नृसिंह घाट तक भक्तो का जमावडा लगा रहता है । इन घाटो पर होती महाआरती, इस उत्सव की भव्यता को एक आयाम तक ले जाती है ।

क्षिप्रा के किनारे-किनारे लगती भक्तो की कतार, असमंजस में डालती है की असल में हमारे बीच एक ऐसी अलौक़िक शक्ति है, जो सब को एक जुट कर, एक लक्ष्य कि आस में , एक महान उत्सव का साक्षी बनाती है । भक्तो की गहरी आस्था और विश्वास इस उत्सव का गौरव बढ़ाते है । भले ही यह उत्सव 12 साल के अंतराल के बाद आता हो, पर इससे कभी लोगो का जोश कम नहीं बल्कि और बढ़ता है।

राहुल कुमार ,

टीम स्टोरीमिरर

 

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