सत्यजीत रे के अस्सी रूपए

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माँ के कहने  पर सत्यजीत  ने  विश्वभारती विश्वविध्यालय,  शांतिनिकेतन में दाखिला तो ले लिया पर उसका मन अभी भी कलकत्ता के उन गली कूचों में ही भटक रहा थाl हालाँकि वो जानता था की शांतिनिकेतन में रहकर वो अपनी कला को नये आयाम दे सकता था l नन्दलाल बोस और बिनोद बिहारी मुखर्जी की छत्रछाया में वो अपनी कला को नये सांचो में ढाल रहा था l लेकिन नजाने उसके मन में ऐसा क्या चल रहा था की दो साल शांतिनिकेतन में बिताने के बाद भी, वो अपने घर और काम करने की इच्छा को भूल नहीं पा रहा था l आखिरकार उसने फैसला लिया और दो साल बाद ही शांतिनिकेतन छोड़ वापस कलकत्ता वापस आ गया l

1943 में कलकत्ता आकर, वो डी.जे केमर जो की एक ब्रिटिश था , की विज्ञापन कंपनी में नौकरी करने लगा l वहां काम करने के उसे महीने के केवल 80 रुपये मिलते थे , पर वो विज्ञापनो के लिए चित्र बनाकर खुश था l 1943 में ही वो डी.के गुप्ता की सिग्नेट प्रेस में भी काम करने लगा l वहां वो किताबो के लिए कवर बनाने लगा l वहां रहते हुए उसने कई किताबो के कवर बनाये जिसमे जिम कॉर्बेट की ‘मैन ईटर्स ऑफ़ कुमाऊँ’ और  पं. जवाहर लाल नेहरु की ‘डिस्कवरी ऑफ़  इण्डिया’ भी शामिल थी l इसी दौरान उनके पास कवर बनाने के लिए ‘बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय’ की किताब ‘पाथेर पांचाली’ आई l इसके कवर पर काम करते हुए सत्यजीत इससे बहुत प्रभावित हुए l

सिनेमा और कला के दीवाने, सत्यजीत को सिग्नेट प्रेस में काम करते हुए 13 साल हो चुके थे । इसी बीच 1949 में फ्रांसीसी निर्देशक जेन रिनोएर अपनी फिल्म की शूटिंग के लिए कलकत्ता आये और उसमे उनकी मदद सत्यजीत ने की । सत्यजीत ने ‘पाथेर पंचाली’ के बारे में उसे बताया । उसने सत्यजीत को इस पर काम करने के लिए कहा । 1949 में ही सत्यजीत ने बिजॉय दास से शादी कर ली l

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एक साल बाद सत्यजीत को प्रेस के काम से लन्दन जाना पड़ा । उसने वहाँ लगभग 100 फिल्मे देखी, जिनमें  से वो ‘बाइसिकल थीफ’ को देखकर बेहद प्रभावित हुआ । जब 3 महीने बाद वो वापस आया तो उसने अपनी पहली फिल्म बनाने का निर्णय लिया । वो फिल्म के दृश्यों को अपनी डायरी में लिखता, और हर दृश्य के संवाद भी साथ में लिखता l जब भी कभी वो निर्माताओ से मिलता, वो इसी के ज़रिये उनको अपनी फिल्म की कहानी सुनाता l पर सब उसके कुछ बदलाव करने के लिए कहते, उनका कहना था की ऐसी फिल्म कौन देखने आएगा जिसमे कोई गाना और कोई प्रेम कहानी न हो l  लेकिन वो फिल्म को अपने तरीके से बनाना चाहता था l

सत्यजीत ने फिल्म को बनाने के लिए सेट बनाने की बजाये असली जगहों पर फिल्माना शुरू किया l शायद इसके पीछे दो कारण होंगे, पहला की सेट लगाने के लिए इतना पैसा नहीं था, दूसरा ये की वो अपनी कल्पना से कोई समझौता नहीं करना चाहते थे l ‘पाथेर पांचाली’ बनाते  वक़्त किसी को भी कोई अनुभव नहीं था, सिवाए कैमरामैन सुब्रत मित्र और कला निर्देशक बंसी चन्द्रगुप्ता के l सत्यजीत ने अपनी सारी बचत इस फिल्म मे लगा दी और उसने ‘बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय’ की पत्नी से भी आर्थिक मदद मांगी l जैसे जैसे पैसो का बंदोबस्त होता जाता, सत्यजीत फिल्म को आगे बनाता रहता l इसी बीच फिल्म फिर पैसो की तंगी के कारण एक लम्बे समय के लिए रुक गई l सत्यजीत फिर भी अपने फैसले पर कायम था, क्योंकि जो कोई फिल्म पर पैसा लगाने के लिए राज़ी होता, वो कहानी में बदलाव कि मांग करता l अंत में पश्चिम बंगाल कि सरकार ने फिल्म को पूरा करने के लिए कुछ पैसे दिए जिससे ‘पाथेर पांचली’ पूरी हो पाई l फिल्म को लोगो ने बहुत सराहा l

ऐसे ही पंडित जवाहर लाल नेहरु भी फिल्म की स्क्रीनिंग में आये, वो फिल्म देखकर बहुत प्रभावित हुए l उन्होंने सत्यजीत की भरोसा दिलाया की उनकी फिल्म को ‘कांस फिल्म फेस्टिवल’ में भेजा जायेगा l कांस में भी ‘पाथेर पांचाली’ ने अपना परचम लहराया और कई इनाम भी जीते l इसके बाद ही सत्यजीत ने सिग्नेट प्रेस से नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह से फिल्मकार बन गए l आगे चलकर पाथेर पांचली ने कई पुरस्कार जीते और वो भारतीय सिनेमा की पहचान बनी l

– Rahul Kumar

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