श्याम बेनेगल – कलात्मक सिनेमा की कोख़

श्याम बेनेगल – कलात्मक सिनेमा की कोख़

मैं जब करीब आठवीं जमात में था तब उस दौरान रविवार के दिन दूरदर्शन पर एक फ़िल्म चल रही थी, समय वही क़रीब शाम के साढ़े चार या पांच का हो रहा होगा | उस फ़िल्म का नाम ‘मंडी’ था | सभी परिवार वाले और आस पड़ोस के लोग, बच्चे, औरतें सभी फ़िल्म पर अपनी नज़र और कान गडाए हुए थे, और वैसे भी गाँव में उस समय इक्का- दुक्का ही टेलिविज़न सेट हुआ करते थे | सभी को उस दौरान सिर्फ़ और सिर्फ़ मनोरंजन की दरकार होती थी | लेकिन मंडी का कथानक मनोरंजक होने के साथ साथ एक सन्देश भी समाज के चेहरे पे लीपता है | इस फ़िल्म को जिस निर्देशक ने बनाया है ये ब्लॉग उन्हीं पर आधारित है | उनके अन्दर के फ़िल्मी कीड़े ने उन्हें ऐसी फिल्मों को बनाने के लिए प्रेरित किया जिन फिल्मों ने कलात्मक सिनेमा के मैदान में एक ऐसा खूंटा गाड़ा है जिसे आज तक कोई नहीं उखाड़ पाया है |
मंडी के जिक्र से आप समझ गए होंगे की मैं यहाँ किस फ़िल्मकार की बात कर रहा हूँ | श्याम बेनेगल विश्व सिनेमा में एक ऐसा नाम है जिसने कलात्मक सिनेमा को एक नाम दिया, पहचान दी, उंचाई दी.., उन्होंने अपने करिअर की शुरुवात एक ऐड फ़िल्ममेकर के तौर पर की थी | इनके बारे में एक और बात प्रचलित है की ये गुरुदत्त के दूर के रिश्तेदार हैं | तो इससे साफ साफ मालूम होता है कि रचनात्मक दिमाग उन्होंने विरासत में ही हासिल किया था |

बेनेगल ने फीचर फिल्मों के अलावा short films, डॉक्युमेंट्री, दूरदर्शन के लिए भारत एक खोज जैसे अन्य सफल प्रयास भी किये हैं दर्शक वर्ग के लिए | श्याम बेनेगल  का जन्म 14 दिसंबर, 1934 में हुआ था । अंकुर, निशांत, मंथन और भूमिका जैसी फिल्मों के लिये चर्चित बेनेगल समानांतर सिनेमा के अग्रणी निर्देशकों में शुमार किये जाते हैं।

श्याम को 1976 में पद्मश्री और 1961 में पद्मभूषण सम्मान दिये गये। 2007 में वे अपने योगदान के लिये भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाज़े गये। सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फीचर फिल्म के लिये राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाँच बार जीतने वाले वे एकमात्र फिल्म निर्देशक हैं। उनके सिनेमा को देखते हुए आपको ये भी महसूस हो सकता है की आप कोई कविता पढ़ रहे हैं और वो अभी अभी आपकी नज़रों के सामने साकार हो रही है | श्याम बेनेगल अपनी उम्र के समकालीन निर्देशकों में सबसे ज्यादा सक्रिय निर्देशक हैं | इनकी हाल फ़िलहाल की जो film मैंने देखी है वो वेलडन अब्बा है जो कि एक राजनितिक व्यंग है | film को जिस आत्मा के साथ बेनेगल साहब ने बनाया है उससे साफ़ ज़ाहिर होता है नए ज़माने की जो नब्ज इन्होने पकड़ी है वो शायद ही कोई पकड़ पाए | वेलडन अब्बा इतनी बड़ी सफल film नहीं रही लेकिन अपने उद्देश्य को पूरा करने में कामयाब रही है | इस film के थोड़ा सा पहले इनकी एक और film वेलकम टू सज्जनपुर सुनहरे परदे पर अवतरित हुई जो की दर्शकों और आलोचकों का ध्यान खींचने में सफल रही |

आलोचक भी श्याम बेनेगल को कलात्मक सिनेमा का जादूगर समझते हैं जो सिनेमा के परदे पर जादू रचने के लिए कैमरे के पीछे रह कर अपना काम बखूबी करना जानते हैं | अपनी  पहली फ़िल्म ‘अंकुर’ (1973) बनाने से पहले उन्होंने 900 से भी ज़्यादा विज्ञापन फ़िल्में और 11 कॉरपोरेट फ़िल्में बनाई थीं । ग्रामीण आन्ध्र प्रदेश की पृष्ठभूमि पर बनी यथार्थवादी फ़िल्म ‘अंकुर’ की व्यावसायिक सफलता से ‘भारतीय समान्तर सिनेमा आन्दोलन’ के युग का उदय हुआ, जिसकी शुरुआत कुछ वर्ष पहले मृणाल सेन की ‘भुवनशोम’ ने की थी।

इस विलक्षण फ़िल्मकार की  रचनाशैली का चमत्कार था कि उनके आलोचक भी उनकी प्रतिभा के कायल हुए बिना नहीं रह पाए । श्याम बेनेगल की फ़िल्में अपने राजनीतिक सामाजिक वक्तव्य के लिए जानी जाती हैं । श्याम के शब्दों में ‘राजनीतिक सिनेमा तभी पनप सकता है, जब समाज इसके लिए माँग करे। मैं नहीं मानता कि फ़िल्में सामाजिक-स्तर पर कोई बहुत बड़ा बदलाव ला सकती हैं, मगर उनमें गंभीर रूप से सामाजिक चेतना जगाने की क्षमता जरूर मौजूद है |  भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने श्याम बेनेगल के बारे में कहा था कि उनकी फ़िल्में मनुष्य की मनुष्यता को अपने मूल स्वरूप में तलाशती हैं । इस प्रतिक्रिया का आधार था एक वृत्तचित्र-नेहरू । इसके निर्देशक थे श्याम बेनेगल । मजे की बात है कि इन्हीं बेनेगल ने आपातकाल के दौरान श्रीमती गाँधी की नीतियों की तीखी आलोचना की थी । तो इन सबका तात्पर्य ये हुआ की बेनेगल साहब ने जितना भी सिनेमा दर्शकों के लिए बनाया वो कहीं न कहीं अर्थपूर्ण रहा है, लोगों के लिए इनका सिनेमा बहुत महत्व रखता है, रखेगा |

श्याम बेनेगल साहब छठे ऐसे भारतीय हैं जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने एक्सीलेंस इन सिनेमा का अवार्ड मिला है | मुझे अभी भी उम्मीद है की बेनेगल साहब एक बार फिर से सिनेमा के दंगल में कलात्मक सिनेमा की कुश्ती खेलेंगे | उनके सिनेमा ने हमें एक सोच दी है अपनी दृष्टि बदलने की, और वही सोच हमें सिनेमा के प्रति अपना दृष्टिकोण रखने का साहस प्रदान करती है |

-Ashish Jangra

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