इम्तियाज़ अली-सिनेमा में इश्क़

इम्तियाज़ अली-सिनेमा में इश्क़

“इश्क़ इक ‘मीर’ भारी पत्थर है, कब ये तुझ कमज़ोर से उठता है”, मीर तकी मीर साहेब का ये शेर हर उस आशिक़ के लिए नज़र है, जो इश्क़ में तबाह हो जाने की आरज़ू रखता है | इश्क़ पर वैसे तो दुनिया भर के मकबूल शायरों, लेखकों, विचारकों ने अपना मत अपनी किसी न किसी रचना में जरुर रखा है, चाहे फिर इश्क़ सकारात्मक रूप में हो या नकारात्मक रूप में, लेकिन उनके दिमाग-ओ-दिल  में इश्क़ रहा ज़रूर है | वोन गॉग का इश्क़ हो, रूसो का इश्क़ हो, लैला मजनूं का इश्क़ हो, शीरी फ़रहाद का इश्क़ हो, हर इश्क़ अपने आप में सिर्फ इश्क़ ही रहा है |

आज के इस समकालीन समय में सिनेमा में अब उस तरह का इश्क़ नदारद हो चूका है जिसकी उम्मीद दर्शक करते हैं | इम्तियाज़ अली एकदम से भारतीय दर्शकों के लिए इश्क़ की सूफ़ियाना चादर ओढके बुल्लेशाह के जैसे सिल्वर स्क्रीन पे एक ऐसा इश्क़ रचते हैं जैसे की मानों खुद ग़ालिब साहब इश्क़ की शायरी पढ़ रहे हों |

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इम्तियाज़ ने दिल्ली के हिन्दू कॉलेज में पढाई के दौरान ही समझ लिया था कि सिनेमा ही उनकी कर्मभूमि होगी | हिन्दू में पढ़ते हुए ही इन्होनें थिएटर करना शुरू कर दिया था | इसके अलावा कॉलेज के बाहर भी इम्तियाज़ ने एक्ट वन नामक थिएटर ग्रुप में नाटक लिखने और प्ले करने शुरू कर दिए थे | उस वक़्त ही इनकी दोस्ती अनुराग कश्यप, मनोज वाजपेई, पियूष मिश्रा जैसे फ़िल्म दिग्गजों के साथ हुई थी | जमशेदपुर जैसे छोटे शहर से होने के बावज़ूद इम्तियाज़ के सपने हमेशा से फिल्मों में कुछ कर गुजरने के रहे हैं |

मुंबई पहुँचते ही इम्तियाज़ ने टीवी में हाथ आज़माया और टीवी में जब इन्हें बोरियत होने लगी तो इन्होनें अपनी पहली फ़िल्म की कहानी लिखी “सोचा था” |

इस फ़िल्म में इन्होनें अभय देओल को नायक के रूप में पहला मौका दिया | फ़िल्म चली नहीं लेकिन इम्तियाज़ अली का श्रीगणेश हो चूका था फिल्मी दुनिया में | जब वी मेट में इम्तियाज़ ने इश्क़, मुहब्बत, रोमांस का वो नमूना पेश किया जो अभी तक का कोई भी कहानीकार या फिल्मकार नहीं कर पाया था | ये फ़िल्म युवाओं के बीच इतनी लोकप्रिय हो गई की लोगों ने इस फ़िल्म की कहानी को खुद से रिलेट किया | गीत के इश्क़ को हर लड़की ने मानों खुद के अन्दर आत्मसात कर लिया | इस फ़िल्म के बाद इम्तियाज़ ने लव आजकल से युवाओं को एक बार फिर से यथार्थ इश्क़ का स्वाद चखाया | इम्तियाज़ की ये फ़िल्म भी सफल रही |

प्यासा फ़िल्म में कभी गुरुदत्त ने कविता और नासाज़ इश्क़ का ज़िक्र किया था उसी फ़िल्म को ध्यान में रखते हुए इम्तियाज़ अली ने Rockstar का निर्माण किया था |

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इस फ़िल्म में दुखी इश्क़ को म्यूजिक की चादर में लपेटते हुए इम्तियाज़ ने सिल्वर स्क्रीन पे ऐसा जज़्बाती इश्क़ रचा की हर दर्शक हर आलोचक इम्तियाज़ को रोमांस किंग कहने लगा | अभी हाल ही में तमाशा तो आप सबने देखी ही होगी? यहाँ भी उनकी वही इश्क़मयी दुनिया हाज़िर थी अपने ही अंदाज़ में |

इम्तियाज़ अली जवानी के दिनों से ही प्रेम कवितायेँ लिखा करते हैं | इनकी बीवी बताती है कि इम्तियाज़ इतने जज़्बाती थे की मुझसे वादा करने के बाद वो कोई भी वादा तोड़ते नहीं थे | मुंबई से ट्रेन पकड़ते थे और एक थकाऊ लम्बी यात्रा के बाद मुझसे मिलने आते थे, एक दिन की मुलाकात के बाद फिर वापस अपने काम पर लौट जाते थे | इससे पता चलता है की इश्क़ में वफ़ादारी को कितना अहम् समझते हैं इम्तियाज़ अली | स्वभाव से बहुत ही ज्यादा सम्वेदनशील और अन्तर्मुखी हैं इसलिए भी अपनी फिल्मों में यथार्थ प्रेम को ज्यादा स्थान देते हैं |

हम उम्मीद करते हैं कि आगे भी इम्तियाज़ अली इसी तरह से इश्क़ को अपनी फ़िल्मों में उतारते रहें और दर्शकों को इश्क़ के पानी से भिगोते रहें |

Ashish Jangra

www.storymirror.com

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